Tuesday, July 27, 2010

माँ

 










जिस्म को अपने नोच कर
तुझे पिलाया जिसने दूध
उस माँ को तूने
चाय के लिए भी तरसाया।
आँचल की छाँव में तुझ अबोध को रखा
रक्षा-कवच उस माँ का
तू कभी बन नहीं पाया।
छोटे से अपने पेट में भी
रखा तुझे जिसने
उस माँ को
अपनी कोठी में भी
रख नहीं पाया।
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Sunday, June 13, 2010

ਯਤੀਮ


 

  


ਯਤੀਮ ਮੁੰਡੇ ਦੇ ਦੁੱਧ ਧੋਤੇ ਚਿੱਟੇ ਕਪਡ਼ਿਆਂ ਵੱਲ ਨੀਝ ਨਾਲ ਦੇਖਦਿਆਂ ਜੱਗੂ ਨੇ ਪੁੱਛਿਆ, “ਤੂੰ ਸਕੂਲ ਪਡ਼੍ਹਨ ਜਾਨੈਂ?”
“ਹਾਂ ਯਤੀਮਖਾਨੇ ਦੇ ਸਾਰੇ ਬੱਚੇ ਪਡ਼੍ਹਨ ਜਾਂਦੇ ਐ।”
“ਬਡ਼ਾ ਖੁਸ਼ਕਿਸਮਤ ਐਂ!” ਜੱਗੂ ਨੇ ਯਤੀਮ ਮੁੰਡੇ ਨੂੰ ਹਸਰਤਭਰੀ ਨਿਗ੍ਹਾ ਨਾਲ ਦੇਖਦਿਆਂ ਕਿਹਾ।
“ਯਤੀਮ ਨਾਲ ਮਜਾਕ ਨਹੀਂ ਕਰੀਦਾ।” ਮੁੰਡਾ ਦੁਖੀ ਮਨ ਨਾਲ ਬੋਲਿਆ।
“ਖੁਸ਼ਕਿਸਮਤ ਤਾਂ ਹੈਂ ਈਂ। ਮੇਰੇ ਕੋਲ ਨਾ ਤੇਰੇ ਵਰਗੇ ਕਪਡ਼ੇ ਐ ਤੇ ਨਾ ਮੈਂ ਸਕੂਲ ਜਾ ਸਕਦਾ।” ਜੱਗੂ ਦੀਆਂ ਅੱਖਾਂ ਭਰ ਆਈਆਂ।
“ਤੂੰ ਸਕੂਲ ਨਹੀਂ ਜਾਂਦਾ! ਫੇਰ ਸਾਰਾ ਦਿਨ ਕੀ ਕਰਦੈਂ?” ਯਤੀਮ ਮੁੰਡੇ ਨੇ ਹੈਰਾਨੀ ਨਾਲ ਪੁੱਛਿਆ।
“ਹੋਟਲ ’ਚ ਭਾਂਡੇ ਮਾਂਜਦੈਂ।”
“ਤੂੰ ਯਤੀਮਖਾਨੇ ’ਚ ਕਿਉਂ ਨ੍ਹੀਂ ਆ ਜਾਂਦਾ?” ਯਤੀਮ ਮੁੰਡੇ ਨੇ ਹਮਦਰਦੀ ਪ੍ਰਗਟਾਈ।
“ਜੀ ਤਾਂ ਬਹੁਤ ਕਰਦੈ, ਪਰ ਉਹ ਮੈਨੂੰ ਰਖਦੇ ਨ੍ਹੀਂ।”
“ਕਿਉਂ?” ਯਤੀਮ ਮੁੰਡਾ ਬਹੁਤ ਹੈਰਾਨ ਸੀ।
“ਮੇਰੇ ਮਾਂ-ਬਾਪ ਜੋ ਜਿਉਂਦੇ ਨੇ।” ਕਹਿੰਦਿਆਂ ਜੱਗੂ ਦੀਆਂ ਅੱਖਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਪਾਣੀ ਸਿੰਮ ਆਇਆ।
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Thursday, May 13, 2010

गिद्ध




कोसी धूप में बैठे चारों मित्र शनिवार की छुट्टी का आनंद ले रहे थे। सभी अपने-अपने दफ्तर में काम करने वाली लड़कियों के किस्से छेड़े हुए थे। पास में रखा ट्रांजिस्टर फिल्मी गीत सुना रहा था। ट्रांजिस्टर ने अचानक गीत बंद कर वयोवृद्ध नेता, महान स्वतंत्रता सेनानी तथा समाजसेवी ‘आज़ाद जी’ के निधन का शोक-समाचार सुनाया तो सभी को गहरा आघात लगा।
“आज़ाद जी ने देश व समाज को इतना कुछ दिया, थोड़ा हमें भी दे जाते!” पहले ने अपना दुख व्यक्त किया।
“इसे मरना तो था ही, दो दिन और ठहर जाता। भला शनिवार भी कोई मरने का दिन है!” दूसरे की आवाज में झुंझलाहट थी।
“बुढ्ढा दो दिन न सही, एक दिन तो और सांस खींच ही सकता था। रविवार को मरता तो सोमवार की तो सरकार छुट्टी करती ही।” यह तीसरा था।
“आज़ाद जिस दिन बीमार हो अस्पताल पहुँचा, मैं तो उसी दिन से इसकी मौत पर दो छुट्टियों की आस लगाए बैठा था। सोचा था, एक-आध छुट्टी और साथ मिला कर कहीं घूम-फिर आयेंगे। पर इसने सारी उम्मीदों पे पानी फेर दिया!” चौथे ने कहा तो वे सभी गहरे गम में डूब गए।
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Monday, April 5, 2010

एक वोट की मौत




नगरपालिका के लिए मतदान हो रहा था। धूप बहुत तेज थी। मतदान-केंद्र के बाहर मतदाताओं की लंबी कतार लगी थी। शोर मच रहा था। धक्कम-धक्का चल रहा था। दो-तीन लोग तो गरमी सहन न कर सकने के कारण बेहोश होकर गिर चुके थे। दो उम्मीदवारों के बीच बहुत सख्त मुकाबला था।

ऐसे में एक कार्यकर्ता कार से उतरा। वह लगभग भागता हुआ मतदान-केंद्र तक पहुँचा तथा अपने उम्मीदवार को केंद्र से बाहर बुला लिया।

“अपने वार्ड में गरमी से एक साथ दो मौतें हो गई हैं!” कार्यकर्ता ने अपने चेहरे से पसीना पोंछते हुए उम्मीदवार को सूचना दी।

“कौन-कौन मर गया?” उम्मीदवार ने कार्यकर्ता को एक तरफ एकांत में ले जाते हुए पूछा।

“एक तो घीसा कुम्हार मर गया और दुसरी रामू धोबी की घरवाली सरबती।” कार्यकर्ता ने बहुत ही धीमी आवाज में कहा।

उम्मीदवार ने हाथ में पकड़ी मतदाता-सूची को देखा और फिर कहा, “घीसा कुम्हार मर गया तो कोई फर्क नहीं, पर यह रामू धोबी की घरवाली वाला काम खराब हो गया। घीसा तो अपना वोट डाल गया था, लेकिन सरबती का रह गया। इस साली ने भी आज ही मरना था, दो-चार घंटे और ठहर जाती…।”

फिर कुछ सोचते हुए वह कार्यकर्ता को और दूर खींच कर ले गया और बोला, “मुकाबला बहुत कड़ा है। एक-एक वोट का महत्व है। वह साली तो मर गई, हमें तो नहीं मरना। तुम जाओ और इसके पहले कि मौत की खबर यहाँ तक पहुँचे, अपनी घरवाली को घूँघट कढ़वा कर ले आओ। थोड़ी देर के लिए वह ही सरबती बन जायेगी। उसका डील-डौल सरबती-सा ही है।”

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Sunday, February 28, 2010

ਮਕਾਨ




ਮਕਾਨ ਨੂੰ ਦੇਖ ਦੇਖ ਕੇ ਕਿਰਾਏਦਾਰ ਬਹੁਤ ਖੁਸ਼ ਹੋ ਰਿਹਾ ਸੀ। ਉਸ ਨੇ ਕਦੇ ਸੋਚਿਆ ਵੀ ਨਹੀਂ ਸੀ ਕਿ ਸ਼ਹਿਰ ਵਿਚ ਇੰਨਾ ਵਧੀਆ ਮਕਾਨ ਕਿਰਾਏ ਲਈ ਖਾਲੀ ਮਿਲ ਜਾਵੇਗਾ। ਸਭ ਕੁਝ ਤਾਂ ਵਧੀਆ ਸੀ– ਬੈਡਰੂਮ, ਡਰਾਇੰਗ ਰੂਮ, ਬਾਥਰੂਮ, ਕਿਚਨ, ਲੈਟਰੀਨ। ਕਿਤੇ ਕੋਈ ਕਮੀ ਨਹੀਂ ਸੀ।

“ਛੱਤਾਂ ਤਾਂ ਪੱਕੀਆਂ ਹੋਣਗੀਆਂ? ਉਸ ਨੇ ਮਕਾਨ ਮਾਲਕ ਨੂੰ ਸਵਾਲ ਕੀਤਾ।

“ਹਾਂ ਜੀ, ਬਿਲਕੁਲ ਪੱਕੀਆਂ। ਉੱਤੇ ਪਾਣੀ ਦੀ ਟੈਂਕੀ ਵੀ ਐ। ਆਪ ਜਾ ਕੇ ਵੇਖ ਆਓ, ਨਾਲੇ ਆਲਾ-ਦੁਆਲਾ ਵੀ ਵੇਖ ਲਉਗੇ।” ਮਕਾਨ ਮਾਲਕ ਨੇ ਕਿਹਾ।

ਕਿਰਾਏਦਾਰ ਪੌੜੀਆਂ ਚੜ੍ਹ ਕੇ ਛੱਤ ਉੱਪਰ ਗਿਆ ਤੇ ਛੇਤੀ ਹੀ ਵਾਪਸ ਮੁੜ ਆਇਆ। ਹੁਣ ਉਹ ਨਿਰਾਸ਼ ਜਾਪਦਾ ਸੀ।

“ਮਕਾਨ ਤਾਂ ਬਹੁਤ ਵਧੀਆ ਹੈ, ਪਰ ਮੈਂ ਇੱਥੇ ਨਹੀਂ ਰਹਿ ਸਕਦਾ।” ਕਿਰਾਏਦਾਰ ਨੇ ਬਾਹਰ ਵੱਲ ਵਧਦਿਆਂ ਕਿਹਾ।

ਮਕਾਨ ਮਾਲਕ ਬਹੁਤ ਹੈਰਾਨ ਸੀ, ਆਖਰ ਇਸ ਨੂੰ ਇਕਦਮ ਹੋ ਕੀ ਗਿਆ? ਕਿਤੇ ਕੋਈ ਗਲਤ ਫ਼ਹਿਮੀ ਨਾ ਹੋਵੇ, ਸੋਚਦਿਆਂ ਉਸ ਨੇ ਕਿਹਾ, “ ਮਕਾਨ ਭੂਤੀਆ ਨਹੀਂ ਐ ਤੇ ਨਾ ਹੀ ਨੇੜੇ-ਤੇੜੇ ਕੋਈ ਪੁਲਿਸ ਚੌਕੀ ਐ।”

ਫਿਰ ਵੀ ਕਿਰਾਏਦਾਰ ਨੇ ਪਿੱਛੇ ਮੁੜਕੇ ਨਹੀਂ ਦੇਖਿਆ ਤਾਂ ਮਕਾਨ ਮਾਲਕ ਨੇ ਅੱਗੇ ਵਧਕੇ ਉਸ ਦਾ ਰਾਹ ਰੋਕ ਲਿਆ, “ਮਕਾਨ ਤਾਂ ਜੀ ਤੁਸੀਂ ਭਾਵੇਂ ਕਿਰਾਏ ਤੇ ਨਾ ਲਿਓ, ਪਰ ਇਹ ਤਾਂ ਦੱਸ ਜਾਓ ਕਿ ਇਸ ’ਚ ਕਮੀ ਕੀ ਐ? ਲੋਕ ਤਾਂ ਕਹਿੰਦੇ ਐ ਕਿ ਸ਼ਹਿਰ ’ਚ ਮਕਾਨਾਂ ਦਾ ਕਾਲ ਪਿਆ ਏ, ਪਰ ਇੱਥੇ ਏਨਾ ਵਧੀਆ ਮਕਾਨ ਖਾਲੀ ਪਿਆ ਏ।”

ਮਕਾਨ ਮਾਲਕ ਪੂਰੇ ਦਾ ਪੂਰਾ ਪ੍ਰਸ਼ਨ-ਚਿੰਨ੍ਹ ਬਣ ਕੇ ਕਿਰਾਏਦਾਰ ਸਾਹਮਣੇ ਖੜਾ ਸੀ।

“ਤੁਹਾਨੂੰ ਨਹੀਂ ਪਤਾ, ਤੁਹਾਡਾ ਮਕਾਨ ਘਰ ਬਣਨ ਯੋਗ ਨਹੀਂ। ਤੁਹਾਡੇ ਮਕਾਨ ਦੇ ਇਕ ਹੱਥ ਗੁਰਦੁਆਰਾ ਹੈ ਤੇ ਦੂਜੇ ਹੱਥ ਮੰਦਰ।”

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Monday, January 18, 2010

वापसी




“अपने काम से थोड़ा समय निकाल कर, घर पर ज़रूर होकर आना। मम्मी का हालचाल पूछना और अगर रात रुकना ही पड़े तो घर पर ही ठहरना।” पत्नी ने सफर के लिए तैयार होते पति से कहा।
“कोशिश करुंगा,” कहते हुए वह मन ही मन हँस रहा था कि पगली तेरे मायके तेरी छोटी बहन सुमन से मिलने ही तो जा रहा हूँ। सरकारी काम का तो बहाना है, दफ्तर से तो छुट्टी लेकर आया हूँ।
ड्रैसिंग-टेबल के आदमकद शीशे के सामने खड़े हो उसने एक बार फिर से स्वयं को निहारा। फिर मन ही मन कहा, ‘सुमन, उम्र में तो मैं ज़रूर तुमसे सत्रह वर्ष बड़ा हूँ, पर देखने में तुम्हारा हमउम्र ही लगता हूँ।’
अपने सिर पर चमक आए एक सफेद बाल को उसने बड़ी कोशिश के बाद उखाड़ फेंका तथा बालों को फिर से संवारा। फिर चेहरे को रुमाल से पोंछता हुआ वह पत्नी के सामने जा खड़ा हुआ, “कमला, देखने में मैं सैंतीस का तो नहीं लगता।”
“इस सूट में तो तुम खूब जँच रहे हो। सैंतीस के तो क्या, मुझे तो पच्चीस के भी नहीं दीखते।” पत्नी ने प्यार भरी नज़र से देखते हुए कहा तो वह पूरी तरह खिल उठा।
रेलवे स्टेशन पर पहुँच कर उसने बुकस्टाल से एक पत्रिका खरीदी और गाड़ी में जा बैठा।
“भैया, जरा उधर होना।” लगभग पचास वर्षीय एक औरत ने उससे कहा तो उसका मुख कसैला हो गया।
गाड़ी चली तो उसने पत्रिका खोल कर पढ़ना चाहा, लेकिन मन नहीं लगा। उसका ध्यान बारबार सामने बैठी सुंदरयुवती की ओर चला जाता। युवती को देख उसकी आँखों के सामने सुमन का सुंदर हँसमुख चेहरा घूम गया। बीसवर्षीय गुलदाउदी के फूल-सी गदराई सुमन। सुमन को लुभाने के लिए ही तो उसने ससुराल के नज़दीक ट्रांसफर करवाया। और सरकारी काम के बहाने वहाँ महीने में एक चक्कर तो लगा ही आता है।
अब तो उसने नए फैशन के कपड़े सिलवाए हैं, बालों को सैट करवाया है। सिर में से सभी सफेद बाल उखाड़ फेंके हैं।अब तो वह पूरी तरह नवयुवक दीखता है। अब की बार वह सुमन को ज़रूर पटा लेगा–इस विश्वास के साथ ही वह न जाने किन ख्यालों में खो गया।
“अंकल, जरा मैगजीन देना,” सामने बैठी युवती ने उसकी तंद्रा को भंग किया।
उसके दोनों हाथ एकदम सीट पर कसे गए, मानो अचानक लगे झटके से नीचे गिर रहा हो। युवती को पत्रिका थमाते हुए उसकी नज़रें झुकी हुईं थीं। पता नहीं अचानक उसे क्या हुआ, अगले ही स्टेशन पर उतर कर वह घर के लिए वापसी गाड़ी पर सवार हो गया।
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Monday, December 14, 2009

खुशखबरी



दफ्तर में अपनी सीट पर बैठा जैगोपाल काफी परेशान था। बेटी शुशीला के पहला बच्चा होने वाला था। जब से पत्नी व माँ ने इस अवसर पर होने वाले खर्चे का ब्यौरा दिया था, उसकी नींद गायब हो गई थी। कम से कम सात हज़ार रुपये का खर्च था। अगर लड़का हुआ तो यह रकम दस हज़ार से भी अधिक हो सकती थी। उसने कभी नहीं सोचा था कि बात यहाँ तक जा पहुँचेगी। खर्च तो घर का ही पूरा नहीं होता। लड़के के पास स्कूल की युनीफार्म नहीं, लड़की व पत्नी के पास पहनने को कोई ढंग का सूट नहीं। वह आप फटी कालर वाली कमीज पहन कर दफ्तर आता है। शादी तो मकान बेच के कर दी थी और साल भर के त्यौहारों पर दे दिया था कर्जा लेकर। अब वह इतना पैसा कहाँ से लाए?
‘जो होगा, देखा जाएगा। कोई न कोई हल निकल आएगा।’– सोचकर उसने काम की ओर ध्यान लगाने की कोशिश की। मेज की दराज से कागज निकाल कर वह संख्याओं का जोड़ करने लगा। दो और दो चार करते वक्त उसके घर की संख्या बीच में आकर गड़बड़ कर जाती। उसने कागज वापस दराज में रख दिए तथा सोचने लगा–‘अच्छा हो लड़की हो जाए, दो-तीन हजार तो बचेंगे।’
“बाबूजी, आपकी ट्रंककाल।”
चपरासी के शब्दों ने उसकी तंद्रा को भंग किया। ‘अवश्य ही यह फोन शुशीला की ससुराल से होगा’– यह सोच मन पर पड़ा बोझ पांवों पर आ गया। सर्दी के बावजूद पसीने की बूँदें उसके माथे पर चमक आईं। वह धीरे-धीरे कदम घसीटता हुआ टेलीफोन तक पहुँचा। रिसीवर कान से लगा उसने ठंडी और खुश्क आवाज में “हैलो!” कहा।
दूसरी ओर से सुशीला के श्वसुर की आवाज कान में पड़ी तो उसने हाथ से फिसलते रिसीवर को बड़ी कठिनाई से थामा। उसके दिल की धड़कन तेज हो गई। टांगें काँपने लगीं तो उसने पीठ दीवार से लगा ली।
“क्या कहा जी?” उसने ऊँची आवाज में पूछा, “बच्चा पैदा होने से पहले ही मर चुका था…यह तो बहुत ही…!” शेष शब्द उसके मुख में ही अटक गए। फुर्ती से वह अपनी सीट तक पहुँचा और अगले दिन के अवकाश के लिए प्रार्थना-पत्र लिखने लगा।
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