Sunday, February 28, 2010

ਮਕਾਨ




ਮਕਾਨ ਨੂੰ ਦੇਖ ਦੇਖ ਕੇ ਕਿਰਾਏਦਾਰ ਬਹੁਤ ਖੁਸ਼ ਹੋ ਰਿਹਾ ਸੀ। ਉਸ ਨੇ ਕਦੇ ਸੋਚਿਆ ਵੀ ਨਹੀਂ ਸੀ ਕਿ ਸ਼ਹਿਰ ਵਿਚ ਇੰਨਾ ਵਧੀਆ ਮਕਾਨ ਕਿਰਾਏ ਲਈ ਖਾਲੀ ਮਿਲ ਜਾਵੇਗਾ। ਸਭ ਕੁਝ ਤਾਂ ਵਧੀਆ ਸੀ– ਬੈਡਰੂਮ, ਡਰਾਇੰਗ ਰੂਮ, ਬਾਥਰੂਮ, ਕਿਚਨ, ਲੈਟਰੀਨ। ਕਿਤੇ ਕੋਈ ਕਮੀ ਨਹੀਂ ਸੀ।

“ਛੱਤਾਂ ਤਾਂ ਪੱਕੀਆਂ ਹੋਣਗੀਆਂ? ਉਸ ਨੇ ਮਕਾਨ ਮਾਲਕ ਨੂੰ ਸਵਾਲ ਕੀਤਾ।

“ਹਾਂ ਜੀ, ਬਿਲਕੁਲ ਪੱਕੀਆਂ। ਉੱਤੇ ਪਾਣੀ ਦੀ ਟੈਂਕੀ ਵੀ ਐ। ਆਪ ਜਾ ਕੇ ਵੇਖ ਆਓ, ਨਾਲੇ ਆਲਾ-ਦੁਆਲਾ ਵੀ ਵੇਖ ਲਉਗੇ।” ਮਕਾਨ ਮਾਲਕ ਨੇ ਕਿਹਾ।

ਕਿਰਾਏਦਾਰ ਪੌੜੀਆਂ ਚੜ੍ਹ ਕੇ ਛੱਤ ਉੱਪਰ ਗਿਆ ਤੇ ਛੇਤੀ ਹੀ ਵਾਪਸ ਮੁੜ ਆਇਆ। ਹੁਣ ਉਹ ਨਿਰਾਸ਼ ਜਾਪਦਾ ਸੀ।

“ਮਕਾਨ ਤਾਂ ਬਹੁਤ ਵਧੀਆ ਹੈ, ਪਰ ਮੈਂ ਇੱਥੇ ਨਹੀਂ ਰਹਿ ਸਕਦਾ।” ਕਿਰਾਏਦਾਰ ਨੇ ਬਾਹਰ ਵੱਲ ਵਧਦਿਆਂ ਕਿਹਾ।

ਮਕਾਨ ਮਾਲਕ ਬਹੁਤ ਹੈਰਾਨ ਸੀ, ਆਖਰ ਇਸ ਨੂੰ ਇਕਦਮ ਹੋ ਕੀ ਗਿਆ? ਕਿਤੇ ਕੋਈ ਗਲਤ ਫ਼ਹਿਮੀ ਨਾ ਹੋਵੇ, ਸੋਚਦਿਆਂ ਉਸ ਨੇ ਕਿਹਾ, “ ਮਕਾਨ ਭੂਤੀਆ ਨਹੀਂ ਐ ਤੇ ਨਾ ਹੀ ਨੇੜੇ-ਤੇੜੇ ਕੋਈ ਪੁਲਿਸ ਚੌਕੀ ਐ।”

ਫਿਰ ਵੀ ਕਿਰਾਏਦਾਰ ਨੇ ਪਿੱਛੇ ਮੁੜਕੇ ਨਹੀਂ ਦੇਖਿਆ ਤਾਂ ਮਕਾਨ ਮਾਲਕ ਨੇ ਅੱਗੇ ਵਧਕੇ ਉਸ ਦਾ ਰਾਹ ਰੋਕ ਲਿਆ, “ਮਕਾਨ ਤਾਂ ਜੀ ਤੁਸੀਂ ਭਾਵੇਂ ਕਿਰਾਏ ਤੇ ਨਾ ਲਿਓ, ਪਰ ਇਹ ਤਾਂ ਦੱਸ ਜਾਓ ਕਿ ਇਸ ’ਚ ਕਮੀ ਕੀ ਐ? ਲੋਕ ਤਾਂ ਕਹਿੰਦੇ ਐ ਕਿ ਸ਼ਹਿਰ ’ਚ ਮਕਾਨਾਂ ਦਾ ਕਾਲ ਪਿਆ ਏ, ਪਰ ਇੱਥੇ ਏਨਾ ਵਧੀਆ ਮਕਾਨ ਖਾਲੀ ਪਿਆ ਏ।”

ਮਕਾਨ ਮਾਲਕ ਪੂਰੇ ਦਾ ਪੂਰਾ ਪ੍ਰਸ਼ਨ-ਚਿੰਨ੍ਹ ਬਣ ਕੇ ਕਿਰਾਏਦਾਰ ਸਾਹਮਣੇ ਖੜਾ ਸੀ।

“ਤੁਹਾਨੂੰ ਨਹੀਂ ਪਤਾ, ਤੁਹਾਡਾ ਮਕਾਨ ਘਰ ਬਣਨ ਯੋਗ ਨਹੀਂ। ਤੁਹਾਡੇ ਮਕਾਨ ਦੇ ਇਕ ਹੱਥ ਗੁਰਦੁਆਰਾ ਹੈ ਤੇ ਦੂਜੇ ਹੱਥ ਮੰਦਰ।”

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Monday, January 18, 2010

वापसी




“अपने काम से थोड़ा समय निकाल कर, घर पर ज़रूर होकर आना। मम्मी का हालचाल पूछना और अगर रात रुकना ही पड़े तो घर पर ही ठहरना।” पत्नी ने सफर के लिए तैयार होते पति से कहा।
“कोशिश करुंगा,” कहते हुए वह मन ही मन हँस रहा था कि पगली तेरे मायके तेरी छोटी बहन सुमन से मिलने ही तो जा रहा हूँ। सरकारी काम का तो बहाना है, दफ्तर से तो छुट्टी लेकर आया हूँ।
ड्रैसिंग-टेबल के आदमकद शीशे के सामने खड़े हो उसने एक बार फिर से स्वयं को निहारा। फिर मन ही मन कहा, ‘सुमन, उम्र में तो मैं ज़रूर तुमसे सत्रह वर्ष बड़ा हूँ, पर देखने में तुम्हारा हमउम्र ही लगता हूँ।’
अपने सिर पर चमक आए एक सफेद बाल को उसने बड़ी कोशिश के बाद उखाड़ फेंका तथा बालों को फिर से संवारा। फिर चेहरे को रुमाल से पोंछता हुआ वह पत्नी के सामने जा खड़ा हुआ, “कमला, देखने में मैं सैंतीस का तो नहीं लगता।”
“इस सूट में तो तुम खूब जँच रहे हो। सैंतीस के तो क्या, मुझे तो पच्चीस के भी नहीं दीखते।” पत्नी ने प्यार भरी नज़र से देखते हुए कहा तो वह पूरी तरह खिल उठा।
रेलवे स्टेशन पर पहुँच कर उसने बुकस्टाल से एक पत्रिका खरीदी और गाड़ी में जा बैठा।
“भैया, जरा उधर होना।” लगभग पचास वर्षीय एक औरत ने उससे कहा तो उसका मुख कसैला हो गया।
गाड़ी चली तो उसने पत्रिका खोल कर पढ़ना चाहा, लेकिन मन नहीं लगा। उसका ध्यान बारबार सामने बैठी सुंदरयुवती की ओर चला जाता। युवती को देख उसकी आँखों के सामने सुमन का सुंदर हँसमुख चेहरा घूम गया। बीसवर्षीय गुलदाउदी के फूल-सी गदराई सुमन। सुमन को लुभाने के लिए ही तो उसने ससुराल के नज़दीक ट्रांसफर करवाया। और सरकारी काम के बहाने वहाँ महीने में एक चक्कर तो लगा ही आता है।
अब तो उसने नए फैशन के कपड़े सिलवाए हैं, बालों को सैट करवाया है। सिर में से सभी सफेद बाल उखाड़ फेंके हैं।अब तो वह पूरी तरह नवयुवक दीखता है। अब की बार वह सुमन को ज़रूर पटा लेगा–इस विश्वास के साथ ही वह न जाने किन ख्यालों में खो गया।
“अंकल, जरा मैगजीन देना,” सामने बैठी युवती ने उसकी तंद्रा को भंग किया।
उसके दोनों हाथ एकदम सीट पर कसे गए, मानो अचानक लगे झटके से नीचे गिर रहा हो। युवती को पत्रिका थमाते हुए उसकी नज़रें झुकी हुईं थीं। पता नहीं अचानक उसे क्या हुआ, अगले ही स्टेशन पर उतर कर वह घर के लिए वापसी गाड़ी पर सवार हो गया।
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Monday, December 14, 2009

खुशखबरी



दफ्तर में अपनी सीट पर बैठा जैगोपाल काफी परेशान था। बेटी शुशीला के पहला बच्चा होने वाला था। जब से पत्नी व माँ ने इस अवसर पर होने वाले खर्चे का ब्यौरा दिया था, उसकी नींद गायब हो गई थी। कम से कम सात हज़ार रुपये का खर्च था। अगर लड़का हुआ तो यह रकम दस हज़ार से भी अधिक हो सकती थी। उसने कभी नहीं सोचा था कि बात यहाँ तक जा पहुँचेगी। खर्च तो घर का ही पूरा नहीं होता। लड़के के पास स्कूल की युनीफार्म नहीं, लड़की व पत्नी के पास पहनने को कोई ढंग का सूट नहीं। वह आप फटी कालर वाली कमीज पहन कर दफ्तर आता है। शादी तो मकान बेच के कर दी थी और साल भर के त्यौहारों पर दे दिया था कर्जा लेकर। अब वह इतना पैसा कहाँ से लाए?
‘जो होगा, देखा जाएगा। कोई न कोई हल निकल आएगा।’– सोचकर उसने काम की ओर ध्यान लगाने की कोशिश की। मेज की दराज से कागज निकाल कर वह संख्याओं का जोड़ करने लगा। दो और दो चार करते वक्त उसके घर की संख्या बीच में आकर गड़बड़ कर जाती। उसने कागज वापस दराज में रख दिए तथा सोचने लगा–‘अच्छा हो लड़की हो जाए, दो-तीन हजार तो बचेंगे।’
“बाबूजी, आपकी ट्रंककाल।”
चपरासी के शब्दों ने उसकी तंद्रा को भंग किया। ‘अवश्य ही यह फोन शुशीला की ससुराल से होगा’– यह सोच मन पर पड़ा बोझ पांवों पर आ गया। सर्दी के बावजूद पसीने की बूँदें उसके माथे पर चमक आईं। वह धीरे-धीरे कदम घसीटता हुआ टेलीफोन तक पहुँचा। रिसीवर कान से लगा उसने ठंडी और खुश्क आवाज में “हैलो!” कहा।
दूसरी ओर से सुशीला के श्वसुर की आवाज कान में पड़ी तो उसने हाथ से फिसलते रिसीवर को बड़ी कठिनाई से थामा। उसके दिल की धड़कन तेज हो गई। टांगें काँपने लगीं तो उसने पीठ दीवार से लगा ली।
“क्या कहा जी?” उसने ऊँची आवाज में पूछा, “बच्चा पैदा होने से पहले ही मर चुका था…यह तो बहुत ही…!” शेष शब्द उसके मुख में ही अटक गए। फुर्ती से वह अपनी सीट तक पहुँचा और अगले दिन के अवकाश के लिए प्रार्थना-पत्र लिखने लगा।
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Saturday, November 21, 2009

मरुस्थल के वासी



श्याम सुन्दर अग्रवाल

गरीबों की एक बस्ती में लोगों को संबोधित करते हुए मंत्री जी ने कहा, “ इस वर्ष देश में भयंकर सूखा पड़ा है। देशवासियों को भूख से बचाने के लिए जरूरी है कि हम सब सप्ताह में कम से कम एक दिन का उपवास रखें।”
मंत्री जी के सुझाव का लोगों ने तालियां बजा कर स्वागत किया।
“हमीं तो हफ्ता मैं दो दिन भी भूका रहन नै तैयार साँ।” एकत्रित लोगों के आगे खड़े एक व्यक्ति ने कहा।
मंत्री जी उसकी बात सुन कर बहुत प्रभावित हुए व बोले, “जिस देश में आप जैसे देशभक्त लोग हों, वह देश कभी भूखा नहीं मर सकता।”
मंत्री जी जाने लगे तो उन्हें लगा जैसे बस्ती के लोगों के चेहरे प्रश्नचिन्ह बन गए हैं।
उन्होंने बड़ी उत्सुकता के साथ कहा, “आप लोगों को कोई शंका हो तो निःसंकोच उसका समाधान कर लें।”
थोड़ी झिझक के बाद एक वृद्ध बोला, “सरकार, हमनै बाकी पाँच दिन का राशन कहाँ से मिलेगा?”
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Sunday, September 27, 2009

ਜ਼ਰੂਰੀ ਸ਼ਰਤ



ਦਲਾਲ ਮੰਗਤ ਰਾਮ ਸੋਹਨ ਲਾਲ ਦੀ ਬੇਟੀ ਦੇ ਰਿਸ਼ਤੇ ਲਈ ਨਿੱਤ ਨਵੇਂ ਮੁੰਡੇ ਦਾ ਬਿਉਰਾ ਲੈ ਕੇ ਆਉਂਦਾ, ਪਰ ਸੋਹਨ ਲਾਲ ਕੋਈ ਨਾ ਕੋਈ ਕਮੀ ਦੱਸ ਕੇ ਉਸ ਨੂੰ ਪਰਵਾਨ ਕਰਨ ਤੋਂ ਨਾਂਹ ਕਰ ਦਿੰਦਾ। ਕੋਈ ਘੱਟ ਪੜ੍ਹਿਆ ਲਿਖਿਆ ਹੁੰਦਾ, ਕਿਸੇ ਦਾ ਕੰਮ ਧੰਦਾ ਠੀਕ ਨਾ ਹੁੰਦਾ ਤੇ ਕਿਸੇ ਦਾ ਪਰਿਵਾਰ ਬਹੁਤ ਵੱਡਾ ਹੁੰਦਾ।

ਇਕ ਦਿਨ ਮੰਗਤ ਰਾਮ ਬੋਲ ਹੀ ਪਿਆ, “ਆਹ ਏਨਾ ਵਧੀਆ ਰਿਸ਼ਤਾ ਐ। ਮੁੰਡਾ ਪੜ੍ਹਿਆ ਲਿਖਿਆ, ਕਮਾਊ, ਕੰਮ ਧੰਦਾ ਵਧੀਆ। ਮਾਂ ਪਿਓ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ ਘਰ ’ਚ ਇਕ ਛੋਟਾ ਭਰਾ ਈ ਐ, ਯਾਨੀ ਨਿੱਕਾ ਜਿਆ ਪਰਵਾਰ। ਹੋਰ ਤੁਹਾਨੂੰ ਕੀ ਚਾਹੀਦੈ?”

“ਇਹ ਰਿਸ਼ਤਾ ਸਾਡੀ ਇਕ ਜ਼ਰੂਰੀ ਸ਼ਰਤ ਪੂਰੀ ਨਹੀਂ ਕਰਦਾ।” ਸੋਹਨ ਲਾਲ ਬੋਲਿਆ।

“ਕਿਹੜੀ ਜ਼ਰੂਰੀ ਸ਼ਰਤ?”

“ਪਰਵਾਰ ’ਚ ਇਕ ਕੁੜੀ ਜ਼ਰੂਰ ਹੋਣੀ ਚਾਹੀਦੀ ਐ। ਏਥੇ ਨਾ ਮੁੰਡੇ ਦੀ ਭੈਣ, ਨਾ ਭੂਆ। ਜੇ ਘਰ ’ਚ ਕੁੜੀ ਈ ਨਾ ਹੋਈ ਤਾਂ ਉਹ ਸਾਡੀ ਕੁੜੀ ਦਾ ਦੁਖ ਦਰਦ ਕੀ ਸਮਝਣਗੇ?”

“ਨਾ ਜੇ ਕਿਸੇ ਘਰ ਕੁੜੀ ਜੰਮੇ ਈ ਨਾ…?”

“ਜੰਮੇ ਈ ਨਾ…! ਦੋਹਾਂ ਭਰਾਵਾਂ ਦੀ ਉਮਰ ’ਚ ਦਸ ਸਾਲ ਦਾ ਫਰਕ ਐ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਸਾਲਾਂ ’ਚ ਇਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਕੁੜੀਆਂ ਈ ਮਾਰੀਆਂ ਹੋਣੀਐਂ।”

ਸੋਹਨ ਲਾਲ ਦੀ ਦਲੀਲ ਸੁਣ ਮੰਗਤ ਰਾਮ ਨੂੰ ਮੁੰਡੇ ਦੀ ਤਾਰੀਫ ਵਿਚ ਕਹਿਣ ਲਈ ਕੁਝ ਨਹੀਂ ਸੁੱਝਿਆ।

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Friday, September 18, 2009

मकान


मकान को देखकर किराएदार बहुत खुश हो रहा था। उसने कभी सोचा भी न था कि शहर में इतना बढ़िया मकान किराए के लिए खाली मिल जाएगा। सब कुछ बढ़िया था–बेडरूम, ड्राइँगरूम, किचन। कहीं भी कोई कमी नहीं थी।

“छत तो पक्की होगी?” उसने मकान-मालिक से प्रश्न किया।

“हाँ जी, बिलकुल पक्की! ऊपर पानी की टंकी भी है। आप जाकर देख आओ।”

किराएदार सीढ़ियाँ चढ़कर छत पर गया और कुछ देर बाद वापस आ गया। अब वह निराश था।

“अच्छा जी, आपको तकलीफ दी। मकान तो बहुत बढ़िया है, पर मैं यहाँ नहीं रह सकता।”

मकान-मालिक ने कहा, “आपको कोई वहम तो नहीं हो गया? मकान में भूत नहीं है और न ही कोई पुलिस-चौकी इसके आसपास है।”

किराएदार ने जब पीछे पलटकर नहीं देखा तो मकान-मालिक ने आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ लिया, “मकान तो चाहे आप किराए पर न लो, लेकिन यह तो बता दो कि इसमें कमी क्या है? लोग तो कहते हैं कि शहर में मकानों का अकाल-सा पड़ गया है, पर यहाँ इतना बढ़िया मकान खाली पड़ा है।”

मकान-मालिक पूरे का पूरा प्रश्नचिन्ह बनकर किराएदार के सामने खड़ा था।

किराएदार ने मकान-मालिक से अपना हाथ छुड़ाते हुए कहा, “आपको पता नहीं है कि आपका मकान घर के योग्य नहीं है। इसके एक तरफ गुरुद्वारा है और दूसरी तरफ मंदिर।”

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Tuesday, August 18, 2009

रिश्ते










विश्वास का मौसम
ज़रूरत की धरती
’गर मिलें तो
उग ही जाते हैं रिश्ते।
लंबा हो मौसम
हो ज़रख़ेज़ धरती
तो बढ़ते हैं, फलते हैं
खिलखिलाते हैं रिश्ते।
बदले जो मौसम
बदले जो माटी
तो पौधों की भाँति
मर जाते हैं रिश्ते।
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