
विश्वास का मौसम
ज़रूरत की धरती
’गर मिलें तो
उग ही जाते हैं रिश्ते।
लंबा हो मौसम
हो ज़रख़ेज़ धरती
तो बढ़ते हैं, फलते हैं
खिलखिलाते हैं रिश्ते।
बदले जो मौसम
बदले जो माटी
तो पौधों की भाँति
मर जाते हैं रिश्ते।
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‘भला करो’
के दो शब्द ही
अपने धर्म में पाता है
जहाँ तक हो सके
निभाता है
आगे भी वही फैलाता है।
प्यार के लिए ही
समय पर्याप्त नहीं मिलता
नफ़रत के लिए
वक्त कहाँ निकाल पाता है।
किसी के दुख का
सबब न बने
कोई परेशान न हो
ठेस न पहुँचे
किसी मन को
और भावनाएँ
आहत न हो
यही प्रयास करता है
फिर भी
पता नहीं क्यों
ऐसा हो जाता है
कौन
गड़बड़ कर जाता है
फैसले के क्षण
वह
सदा स्वयं को ही
कटघरे में खड़ा पाता है।
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“बच्चा भूखा है, कुछ दे दे सेठ!” गोद में बच्चे को उठाए एक जवान औरत हाथ फैला कर भीख माँग रही थी।
“इस का बाप कौन है? अगर पाल नहीं सकते तो पैदा क्यों करते हो?” सेठ झुंझला कर बोला।
औरत चुप रही। सेठ ने उसे सिर से पाँव तक देखा। उसके वस्त्र मैले तथा फटे हुए थे, लेकिन बदन सुंदर व आकर्षक था। वह बोला, “मेरे गोदाम में काम करोगी? खाने को भी मिलेगा और पैसे भी।”
भिखारिन सेठ को देखती रही, मगर बोली कुछ नहीं।
“बोल, बहुत से पैसे मिलेंगे।”
“सेठ तेरा नाम क्या है?”
“नाम! मेरे नाम से तुझे क्या लेना-देना?”
“जब दूसरे बच्चे के लिए भीख माँगूंगी तो लोग उसके बाप का नाम पूछेंगे तो क्या बताऊँगी?”
अब सेठ चुप था।
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